दोराहा

जो व्यक्ति अपने जीवन को नकार में ढाल लेता है--नकार यानी जो मान कर ही बैठा है कि जीवन व्यर्थ है; जो मान कर ही बैठा है कि यहां कोई परमात्मा नहीं है; जो मान कर ही बैठा है कि जो दिखाई पड़ता है इसके पार और कुछ भी नहीं है। खोजा गया नहीं है, आंख नहीं उठाई है, जो मान कर बैठा है कि भीतर कुछ भी नहीं है लेकिन भीतर कभी झांका नहीं है। ऐसा जो मान कर बैठा है उसके लिए तो दुर्भाग्य की घड़ी आ गई। उसके लिए तो बड़े संकट का क्षण आ गया। आत्मघात के अतिरिक्त अब कुछ भी नहीं सूझेगा। अपने को मिटा लूं, समाप्त कर लूं, बस यही समझ में आएगा। लेकिन जिसने अपने को इस तरह नकार में कस नहीं लिया है, जो कहता है, हो सकता है और भी जीवन हो। जो कहता है, हो सकता है बुद्ध और महावीर, कृष्ण और कबीर, नानक और दादू सही हों। जो कहता है मैं खोजूं, तभी निर्णय लूंगा, उसके जीवन में यह घड़ी आत्मघात की नहीं है, आत्म रूपांतरण की घड़ी है। यहीं से या तो आदमी अपने को मिटाना शुरू करता है या अपने को जगाना शुरू करता है।

यह बड़ा महत्वपूर्ण दोराहा है। और हर जीवन इस दोराहे पर आता है। आज नहीं कल, कल नहीं परसों, एक न एक दिन तुम्हें इस दोराहे पर आना ही होता है, जहां विकल्प होते हैं दो--या तो निराशा में डूब जाओ या नई आशा के गीत को फूटने दो। या तो सब व्यर्थ मान कर हार जाओ, पराजित हो जाओ या कुछ और भी हो सकता है उसके अभियान पर निकलो।

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